श्रीराम की महिमा से आलोकित हुआ भरभरा आश्रम का शिवमन्दिर, लोक एवं भक्ति गायन के साथ नृत्य नाटिका में दिखी श्रीराम की महिमा
कटनी। जिला प्रशासन, श्रीरामचंद्र पथ गमन न्यास और संस्कृति विभाग, द्वारा श्रीरामनवमी के पावन पर्व पर कलानुशासनों में श्रीरामचंद्र की महिमा केन्द्रित’ आविर्भाव समारोह’ का आयोजन शुक्रवार 27 मार्च, को सायं 6:30 बजे से उमरियापान क्षेत्र के शिव मंदिर, भरभरा आश्रम में किया गया। संस्कृति विभाग द्वारा यह आयोजन जिला प्रशासन, के सहयोग से किया गया, जिसमें श्रद्धा, भक्ति और शास्त्रीय-सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के अनुपम संगम ने दर्शकों का मनमोह लिया।
जबलपुर के लोकगायक भवानीदास अहिरवार ने बुंदेली लोकगायन की प्रस्तुति दी। उन्होंने जनम लये राजा राम ने अवध में…. हमखे लगे बड़े प्यारे बड़े लाल हो गये तुम्हारे…. राम लखन सिया जानकी जय बोलो हनुमान की.. .. जो लो राम जियावे रे, दो बातें…. मन भज लैयो राम नाम तारन हारो…, बम-बम भोला नाथ जय-जय माता पार्वती…. जीवनदान दे रही माँ सबको ज्ञान दे रही माँ नर्मदा… जैसे भक्ति गीतों की प्रस्तुति दी। राम भक्ति और शिव स्तुति से सजी उनकी गायकी ने श्रोताओं के हृदय को छू लिया, वहीं, माँ नर्मदा पर आधारित गीत ने आध्यात्मिक भावों को नई ऊँचाई दी।
अगली प्रस्तुति” मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कथक नृत्य नाटिका की हुई। नृत्य नाटिका की संकल्पना एवं कोरियोग्राफी कथक नृत्यांगना डॉ. श्यामा पंडित द्वारा की गई है। प्रस्तुति में भगवान श्रीराम के जी वन के प्रमुख प्रसंगों राम-सीता वनवास, सीता हरण, राम की शक्ति पूजा तथा रावण वध को नृत्य के माध्यम से अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया। तीनताल में निबद्ध इस प्रस्तुति के साथ तोड़े, टुकड़े, परन एवं तिहाइयों के माध्यम से लय, गति और ताल की जटिलताओं को दर्शाया गया। वहीं, भाव पक्ष रूपक ताल में अभिव्यक्त रहा, जहाँ अभिनय, मुखाभिनय एवं गत-भाव के माध्यम से कथा के संवेदनशील एवं भावनात्मक प्रसंगों को जीवंत कर दिया।” राम की शक्ति पूजा” प्रसंग ने भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक ऊर्जा के गहन चित्रण को प्रस्तुत किया, जबकि रावण वध के दृश्य ने वीर रस से परिपूर्ण हो कर दर्शकों में उत्साह और ऊर्जा का संचार कर दिया।
अंतिम मंचन में बुरहानपुर के नितेश सिंह एवं साथी कलाकारों ने भक्तिगायन की प्रस्तुति दी। उन्होंने गणेश वंदना म्हारा कीर्तन में रस बरसाओ… मंगलाचरण के साथ ही पूरे आश्रम परिसर की आध्यात्मिक भावभूमि को भक्ति रस की धारा से सराबोर कर दिया। इसके पश्चात नगरी हो अयोध्या सी रघुकुल सा घराना हो…. दुनिया चले ना श्रीराम के बिना… , मेरी झोपड़ी के भाग आज खुल जायेंगे… गीतों का गायन कर स्वर-साधना की परिपक्वता, संगतकारों के साथ सधा हुआ सामंजस्य तथा भावाभिव्यक्ति की सहजता को पेश किया। अगले कड़ी में श्रीराम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में… और रामजी की निकली सवारी… जैसे भक्तिगीतों की श्रंखला ने श्रोताओं को भक्ति-रस में निमग्न कर दिया। प्रत्येक रचना में निहित श्रद्धा, समर्पण और आध्यात्मिक ऊर्जा नेवातावरण को भक्तिमय बना दिया, जिससे उपस्थित जनसमुदाय भाव-विभोर होकर तल्लीनता के साथ रसास्वादन करता रहा। मधुर धुनों, लयबद्ध प्रस्तुति और अंतर्मन को स्पर्श करने वाली अभिव्यक्ति ने पूरे आयोजन को एक गरिमामय सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक उत्सव के रूप में परिणित कर दिया।








