शिक्षक चले बस्ती की ओर, तब परीक्षा कक्ष तक पहुँचे विद्यार्थी

शिक्षक चले बस्ती की ओर, तब परीक्षा कक्ष तक पहुँचे विद्यार्थी

कटनी। शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान नहीं, बल्कि समाज के अंतिम छोर तक अवसर पहुँचाने का संकल्प है। इस संकल्प की एक प्रेरक मिसाल बुधवार को आदिवासी अंचल स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नैगवां में देखने को मिली। कक्षा 9वीं एवं 11वीं की द्वितीय परीक्षा के दिन बुधवार की सुबह जब विद्यालय खुला, तो परीक्षा कक्ष लगभग खाली था। निर्धारित समय पर केवल एक छात्रा ही परीक्षा देने पहुँची थी। यह दृश्य देखकर विद्यालय परिवार चिंतित हो उठा। लेकिन हार मानने के बजाय प्राचार्य विपिन तिवारी ने स्वयं जिम्मेदारी संभाली।
वे एक सहयोगी शिक्षक के साथ निजी वाहन से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी बस्तियों खुसरा और रामपुरा पहुँचे। वहाँ का दृश्य शिक्षा के सामने मौजूद चुनौतियों की कहानी कह रहा था। कुछ विद्यार्थी अभी नींद में थे, तो कुछ बिना किसी चिंता के इधर-उधर घूम रहे थे। अभिभावकों में भी परीक्षा को लेकर विशेष जागरूकता दिखाई नहीं दी। इसके बावजूद शिक्षकों ने अपने दायित्व को केवल विद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाया, प्रेरित किया और अपने वाहन से विद्यालय लाकर परीक्षा में शामिल कराया। उल्लेखनीय है कि इन विद्यार्थियों में कई ऐसे भी थे जिन्होंने परीक्षा शुल्क तक जमा नहीं किया था, फिर भी उनका भविष्य प्रभावित न हो, इसके लिए हरसंभव प्रयास किए गए।
कलेक्टर आशीष तिवारी के मार्गदर्शन एवं जिला शिक्षा अधिकारी के निर्देशन में आदिवासी अंचलों में शिक्षा की अलख जगाने का अभियान लगातार जारी है। यह घटना बताती है कि जब शिक्षक केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और अभिभावक की भूमिका निभाता है, तब शिक्षा की रोशनी दूर-दराज़ बस्तियों तक पहुँचती है। सच तो यह है कि जब शिक्षक घर-घर पहुँचता है, तभी विद्यार्थी परीक्षा कक्ष तक पहुँच पाता है; और तभी शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती है।

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Author: RashtraRakshak

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