शीर्ष अदालत से मप्र के डेढ़ लाख शिक्षकों को झटका, टीईटी देना अनिवार्य, अनुभव के आधार पर छूट संभव नहीं, शिक्षक नेताओं के गढ़ कटनी से भी हुआ था टीटीई का विरोध

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के करीब डेढ़ लाख शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) मामले में देश की शीर्ष अदालत से बड़ा झटका लगा है। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिए कि अब टीईटी से अतिरिक्त छूट नहीं दी जा सकती और शिक्षक के रूप में बने रहने अथवा नियुक्ति जारी रखने के लिए पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करना आवश्यक होगा।
यह बोली अदालत
अदालत ने कहा कि वर्ष 2017 में लागू नियमों के तहत शिक्षकों को पहले ही पांच वर्ष की पर्याप्त राहत दी जा चुकी थी। अब यह अवधि समाप्त हो चुकी है, इसलिए आगे और छूट देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। हालांकि न्यायालय ने अंतिम निर्णय सुरक्षित रखा है, लेकिन उसकी टिप्पणियों से यह स्पष्ट माना जा रहा है कि पुराने शिक्षकों को भी टीईटी पास करना अनिवार्य हो सकता है।
यह है पूरा मामला
यह विवाद उन शिक्षकों से संबंधित है जिनकी नियुक्ति वर्ष 1998 से 2009 के बीच हुई थी। शिक्षकों की ओर से दायर याचिकाओं में मांग की गई थी कि लंबे शिक्षण अनुभव और पूर्व नियुक्तियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें टीईटी परीक्षा से छूट दी जाए। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षकों को पुनः पात्रता परीक्षा देना व्यावहारिक नहीं है। लेकिन न्यायालय ने अनुभव के आधार पर छूट देने के तर्क को स्वीकार नहीं किया और संकेत दिया कि गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित पात्रता मानकों का पालन सभी शिक्षकों के लिए समान रूप से आवश्यक है।
कटनी में भी हुआ विरोध
शिक्षक नेताओं के गढ़ माने जाने वाले कटनी जिले में भी टीटीई का जमकर विरोध हुआ। शिक्षक नेताओं की अगुवाई में जिले भर के शिक्षकों ने प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए पुरजोर विरोध किया। सरकार को आड़े हाथ लेते हुए विरोध प्रदर्शन कर रहे शिक्षक नेताओं ने कड़े शब्दों में सरकार को चेतावनी भी दी थी। लेकिन अब न्यायालय के रुख से ऐसा लगता है कि शिक्षक नेताओं और शिक्षकों के टीटीई परीक्षा से बचने के लिए किए गए सारे प्रयास बेमायने हो जाएंगे।

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Author: RashtraRakshak

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